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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, Verses 34–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 128, verses 34–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 128 · श्लोक 34-39

संस्कृत श्लोक

नित्यानन्दे समस्तज्ञे परे परमकारणे । नित्यं सर्वगतं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् ॥ ३४ ॥ निष्कलं निष्क्रियं शुद्धं तद्ब्रह्मास्मि परं परम् । हेयोपादेयनिर्मुक्तं सत्यरूपं निरिन्द्रियम् ॥ ३५ ॥ केवलं सत्यसंकल्पं शुद्धं ब्रह्मास्म्यहं परम् । पुण्यपापविनिर्मुक्तं कारणं जगतः परम् ॥ ३६ ॥ अद्वितीयं परं ज्योतिर्ब्रह्मास्म्यानन्दमव्ययम् । एवमादिगुणैर्युक्तं सत्त्वादिगुणवर्जितम् ॥ ३७ ॥ प्रविष्टं सकलं ब्रह्म सदा ध्यायेत्स्वकर्मकृत् । एवमभ्यसतः पुंसो मनोऽस्तं याति तत्र वै ॥ ३८ ॥ मनस्यस्तं गते तस्य स्वयमात्मा प्रकाशते । प्रकाशे सर्वदुःखानां हानिः स्यात्सुखमात्मनि ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

(निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निर्जनम्‌” इत्यादि श्रुति के साथ अपना अनुभव मिलाकर बतलाते हैं । नित्य, सर्वव्यापी, शान्त, सर्वदोषरहित, निरंजन, निष्कल, निष्क्रिय, केवल शुद्ध वह परब्रह्म मैं ही हूँ। हेय और उपादेय से निर्मुक्त सत्यस्वरूप, इन्द्रियरहित, एकमात्र अपने संकल्प से असद्रूप भी इस जगत्‌ की सत्ता के सम्पादन में समर्थ सद्रूप, केवल शुद्ध परब्रह्म ही मैं हूँ पुण्य ओर पाप से रहित, जगत्‌ का परम कारण, अद्वितीय, आनन्दरूप, अविनाशी और ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म ही मैं हूँ इस तरह सत्यसंकल्पादिगुणों से युक्त, माया के सत्व आदि गुणों से शून्य, सर्वव्यापक और सर्वस्वरूप ब्रह्म का - अध्यात्मशास्त्रों के श्रवण तथा गुरु की शुश्रूषा (सेवा) आदि में तत्पर एवं अपने वर्णाश्रमधर्म में निष्ठा रखनेवाला योगाभ्यासी पुरुष सदा ध्यान करे । इस रीति से परब्रह्म का अभ्यास कर रहे साधक पुरुष का मन उसी ब्रह्म में अस्त हो जाता है और उसके मन के अस्त हो जाने पर आत्मा स्वयं प्रकाशित होने लग जाता है । प्रकाश होने पर सम्पूर्ण दुःखों का अन्त हो जाता है और आत्मा मेँ सुख अवभासित होने लगता है तथा आत्मा स्वयं ही अपने-आप अपने आनन्दस्वरूप को प्राप्त होता हे