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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 14

तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग॑ पूर्व सर्ग में वर्णित जीवभावमें परिच्छेद आदि सन्देहो का युकिति से खण्डन कर केवल मात्र ब्रह्मैक्य का वर्णन |

54 verse-groups

  1. Verses 1–10सबसे पहले समष्टि (हिरण्यगर्भ), उससे उत्पन्न विराट्‌ और व्यष्टि जीव इस प्रकार के परिच्छेद…
  2. Verse 11विराट्‌ घनसंकल्पस्वरूप है, उसका कार्य होने से व्यष्ट्यात्मक जीव भी संकल्प ही है, पृथिवी आ…
  3. Verse 12व्यष्टि ओर समष्टि दोनो एकस्वभाव हैँ । एकस्वभाव होने के कारण दोनो की एकता को सिद्ध कर उससे…
  4. Verses 13–14सहकारी कारणों के न रहने पर कार्य ओर कारण एक ही यानी अभिन्न ही रहता हे, पृथक्‌ नहीं, अतः स…
  5. Verse 15व्यष्टि, समष्टि ओर उन दोनो की मूलभूत वस्तु के एक होने पर व्यष्टि ओर समष्टि का मिथ्यात्व ओ…
  6. Verse 16व्यष्टि जीव को मानकर कल्पित समष्टि माननी चाहिए, अन्यथा मेघ की वृष्टिधार के समान, समुद्र क…
  7. Verse 17भगवन्‌, मेरी शंका को दूर करने के लिए मुझसे जीवसमूह का निर्णय कीजिए । विशेषरूप से जानने की…
  8. Verses 18–23केवल एकमात्र ब्रह्म ही है, यह सिद्ध करना हमारा प्रयोजन है, उक्त प्रयोजनकी सिद्धि के लिए ह…
  9. Verse 24इस प्रकार से इसका (ब्रह्म का) विकास केवल अविद्या से ही होता है, स्वतः नहीं, अविद्या की नि…
  10. Verse 25अज्ञान जब निवृत्त होता है, तब निवृत्त हुआ अज्ञान किस रूप से रहता है ? ज्ञानरूप से उसका शे…
  11. Verse 26जिस विषय का पहले विस्तार से उपपादन कर आये हैं, उसीका अब उपसंहार करते है । इस प्रकार अखण्ड…
  12. Verse 27ब्रह्म सब प्रकार से देश, काल ओर परिमाण से अपरिच्छिन्न है, अतः वास्तव में उसका कहीं पर भी…
  13. Verse 28श्रीवसिष्ठजी ने जो कहा, उसको स्वीकार कर, श्रीरासचन्द्रजी जैसा कि आप कह आये हैं, वैसे ही य…
  14. Verses 29–30ब्रह्म पहले सत्यसंकल्पवाले समष्टिजीवभाव को प्राप्त होता है, तदनन्तर अपने संकल्प के अधीन र…
  15. Verses 31–32अन्य महर्षियों का भी तो, क्रियाक्रम के बिना, संकल्प से ही कार्य सम्पन्न होते देखा जाता है…
  16. Verse 33जिस जीव की (महर्षि आदि की) इच्छा कार्य को उत्पन्न करती है, वह प्रधान शक्ति की अपेक्षा करक…
  17. Verse 34उक्त क्रियाक्रम की भी फल सिद्धि प्रधान के संकल्प के अधीन ही है, ऐसा कहते हैं । यदि प्रधान…
  18. Verse 35इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि ब्रह्म ही महाजीव है और महाजीव ही व्यष्टिजीव और समष्टि जीव…
  19. Verses 36–37पहले विस्तार से कही गई बातों को ही, सरलता से उनका ज्ञान हो इसलिए, संक्षेप से दिखलाते हैं…
  20. Verses 38–39जीवों को ब्रह्मभाव की प्राप्ति या तो उपासना द्वारा समष्टिजीवभाव (हिरण्यगर्भ भाव) प्राप्ति…
  21. Verses 40–42चिति का चमत्कार क्या है ? इस प्रश्न पर चमत्कार के विषय मे कहते हैं। जगत्‌ के संस्कार से स…
  22. Verses 43–44तथापि पहले अहन्ता का दर्शन होता है, तदुपरान्त अहन्ता द्वारा किये गये परिच्छिन्न जगत्रूप क…
  23. Verse 45इस कथन से यह सिद्ध हुआ कि चित्‌ के चमत्कार का ही जगत्‌“ यह नाम रक्खा गया है, जगत्‌ कोई पृ…
  24. Verse 46चिति अहंकार की कल्पना करती है, अहंकार में तन्मात्रादिरूप जगत्‌ की कल्पना होती है। ऐसी परि…
  25. Verse 47सत्य ओर असत्य कल्पनाओं के मध्य में त्वम्‌” अहम्‌” इस प्रकार वेतन के परिच्छेद की जो कल्पना…
  26. Verse 48ज्ञान से दृश्य और दुश्य की सत्ता का नाश होने पर पूर्वसिद्ध जो अधिष्ठानसत्ता है, वह ज्यो-क…
  27. Verse 49पूर्वोक्त रीति से बतलाये गए निष्प्रपंचत्व को (प्रपंच के अभाव को) अनुमान से भी दृढ़ करते ह…
  28. Verse 50उक्त अनुमान में व्याप्ति आदि की सिद्धि के लिए उदाहरण (रष्टान्त) आदि दिखलाते हैं । जो वस्त…
  29. Verse 51उपर्युक्त कथन से यह निष्कर्ष निकला कि नाम और रूप से रहित तथा अपरिच्छिन्न (असीम) चित्‌ का…
  30. Verse 52यदि कोड इसे चिद्रूप न देखकर जगद्रूप देखे, तो भी यह जगद्रूप रवना चित्‌ की ही रचना है, ऐसा…
  31. Verse 53यों जगत्‌ के चिन्मय (चैतन्यमय) होने पर जगत्‌ चिति का धर्म ही सिद्ध होता है, ऐसा कहते हैं।…
  32. Verse 54पहले वर्णित जगत्‌ की चिन्मात्रता का, वचनभंगी से भलीभाँति बोध कराने के लिए, फिर वर्णन आरम्…
  33. Verses 55–56तदुपरान्त चित्त से अहंकारशक्ति का स्फुरण ही स्पन्दशक्ति प्राण के साथ मिलकर जीवशब्द से कहा…
  34. Verse 57वैसा होने पर भी चित्‌ के स्वभाव में अन्तर नहीं आता, ऐसा कहते हैं। यद्यपि चित्‌ का चित्त्व…
  35. Verse 58चित्त, मन, इन्द्रिय आदि भाव में भी जीवकरत भेद नहीं होता, क्योकि जीव का उपाधिरूप मन ही विभ…
  36. Verse 59पूर्वोक्त रीति से जगत्‌ और जीवकृत भेद का खण्डन करने पर निष्कर्ष कहते हुए उपसंहार करते हैं…
  37. Verses 60–61उक्त ज्ञान होने पर सम्पूर्ण अनर्थो की निवृत्ति हो जाती है, ऐसा दशति हैं। तदनन्तर सच्चिदान…
  38. Verse 62यह न जानने से ही द्वैतवादी इस विषय में वादविवाद करते हैं, पर हम लोगों को इसमें विवाद नहीं…
  39. Verse 63चिद्रूपी वसन्त की शोभाभूत माया दृश्यमें आसक्तिरूप (अनुरागरूप) जल के सिंचन से चित्रूपी वृक…
  40. Verses 64–65जैसे ब्रह्म स्वाधीन कल्पनाओं के रमसे जगद्‌भाव ओर जीवभावको प्राप्त हुआ है, वैसे ही स्वाधीन…
  41. Verse 66सम्पूर्ण जगत्‌ को आह्वादित करनेवाला चन्द्रमा भी वह स्वयं ही हुई, ऐसा कहते है । सदा उदित च…
  42. Verse 67चिति स्वयं अपने (चैतन्यरूप ब्रह्म के) ज्ञान से ही दृश्य प्रपंच के विनष्ट होने पर उदित हुए…
  43. Verse 68जो बात पहले ऊपर कही जा चुकी है, उसीको संक्षेप में कहते हैं । चिन्मय ब्रह्म ही अविचारदशा म…
  44. Verses 69–71चिन्मय का संसार है या नहीं है 2 यदि है, तो उसमें संसारापत्ति हो जायेगी । यदि नहीं है, तो…
  45. Verses 72–75यह त्रिजगत्‌श्रेणी चिद्रूपी अग्नि की उष्णता है यानी जैसे अग्नि का उष्णता से भेद नहीं है,…
  46. Verse 76सर्वत्र चित्‌ से भिन्न सत्तावान्‌ होने से ही जगत्‌ चिद्धर्म माना गया है, ऐसा स्पष्टरूप से…
  47. Verse 77सावयव और निरवयव पदार्थो की कैसे अभिन्न सत्ता होगी ? यों कह रहे और विद्वानों के अनुभव का अ…
  48. Verse 78उक्त विषय में युक्तिविरोध भी कहते हैँ । चिन्मय होने के कारण जिसमें पर्वत, सागर,पृथिवी, नद…
  49. Verse 79शिला के (पत्थर के) हृदय के (मध्य के) समान अत्यन्त निबिड (ठोस) होती हुई भी चिति स्फटिक आदि…
  50. Verse 80सम्पूर्ण प्रपच शान्त कैसे है, इस पर कहते हैं । सम्पूर्ण पदार्थो के अधिष्ठानभूत चिदाकाश मे…
  51. Verse 81ऐसा यदि है, तो चित्‌ में असत्‌ जगत्‌ के आकार का भान कैसे होता है, इस पर कहते हैं । जैसे प…
  52. Verses 82–83जगतूरूप विकार का निर्विकार चिदाकाश उपादान है, अतएव जगत्‌ असत्‌ है, ऐसा अब तक कहा । अव हजा…
  53. Verse 84यदि जगत्‌ स्वतः (अपनी सत्ता से न कि ब्रह्मसत्ता से) सत्‌ होता, तो ज्ञान आदि सहतस्त्रों उप…
  54. Verses 85–86यदि दृश्य प्रपंच की सत्ता में आपका बड़ा ही आग्रह हो, तो अनुभव से (ज्ञान से) चित्‌ ओर दृश्…