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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 55–56

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 55–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

चित्तात्स्वशक्तिकचनं यदहंभावनं चितः । जीवः स्पन्दनकर्मात्मा भविष्यदभिधो ह्यसौ ॥ ५५ ॥ यच्चिच्चित्त्वेन कचनं स्वसंपाद्याभिधात्मकम् । स्वविकारैर्व्यवच्छेद्यं भिद्यते नो न विद्यते ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

तदुपरान्त चित्त से अहंकारशक्ति का स्फुरण ही स्पन्दशक्ति प्राण के साथ मिलकर जीवशब्द से कहा जाता है, ऐसा कहते हैं। चित्‌ का चित्त से (संकल्प द्वारा) अपनी शक्ति का विकास रूप जो अहंकार है, वह स्पन्दशक्ति प्राण से युक्त होकर भविष्य में “जीव” नाम को प्राप्त होता हे