Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
चमत्कारकरी चारु यच्चमत्कुरुते चितिः ।
स्वयं स्वात्मनि तस्यैव जगन्नाम कृतं ततः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस कथन से यह सिद्ध हुआ कि चित् के चमत्कार का ही जगत्“ यह नाम रक्खा गया है,
जगत् कोई पृथक् वस्तु नहीं है, ऐसा कहते है ।
चमत्कार करना (चमकना) चित् का स्वभाव ही है । चमत्कार करनेवाली चिति अपने
स्वरूप में स्वयं जो सुन्दर चमत्कार करती है, उसी का नाम जगत् रख दिया गया है