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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । एवमेतत्कथं ब्रह्मन्नेकजीवेच्छयाखिलाः । जगज्जीवा न युज्यन्ते महाजीवैकतावशात् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने जो कहा, उसको स्वीकार कर, श्रीरासचन्द्रजी जैसा कि आप कह आये हैं, वैसे ही यदि व्यष्टि ओर समष्टि जीवों का अभेद माना जाय, तो समष्टि की इच्छा (सत्यसंकल्प) जैसे अमोघ है, वैसे ही व्यष्टि जीवों की इच्छा भी समष्टि का धर्म होने से अमोघ हो जायेगी, ऐसी परिस्थिति मे अमुक को भोग ओर अमुक को मोक्ष होता है, ऐसी शास्त्र की व्यवस्था नहीं बनेगी, क्योकि सत्यसंकल्य होने से जो-जो चाहेगा, वही हो जायेगा ऐसी शंका करते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, आपका कथन ठीक है, उसको मैं स्वीकार करता हूँ । पर इसमें मुझे एक सन्देह होता है वह यह कि एक जीव की जैसी इच्छा होती है, वैसी ही इच्छा जगत्‌ के अन्यान्य सम्पूर्ण जीवों की क्‍यों नहीं होती ? क्योकि महाजीव तो एक ही है, उसीके अनुसार सब जीवों में एक ही इच्छा होनी चाहिए, यह भाव है