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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

स्वयमस्तं गते बाह्ये स्वज्ञानादुदिता चितिः । स्वयं जडेषु जाड्येन पदं सौषुप्तमागता ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

चिति स्वयं अपने (चैतन्यरूप ब्रह्म के) ज्ञान से ही दृश्य प्रपंच के विनष्ट होने पर उदित हुए अपने पूर्ण भाव को प्राप्त होकर स्थित होती है और स्वयं ही जड़तावश स्थावर आदि जड पदार्थो में अहम्भाव करने से सुषुप्त पदको (अज्ञानताको) प्राप्त होती है