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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 36–37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 36–37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

चेत्यसंवेदनाज्जीवो भवत्यायाति संसृतिम् । तदसंवेदनाद्रूपं समायाति समं पुनः ॥ ३६ ॥ एवं कनिष्ठजीवानां ज्येष्ठजीवक्रमाक्रमैः । समुदेत्यात्मजीवत्वं ताम्राणामिव हेमता ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले विस्तार से कही गई बातों को ही, सरलता से उनका ज्ञान हो इसलिए, संक्षेप से दिखलाते हैं । ब्रह्म ही विषयों के संकल्प से (चिन्तन से) जीव होता है और जन्ममरणरूप संसार को प्राप्त होता है विषयसंकल्प का त्याग करने से फिर वैषम्यरहित ब्रह्मस्वरूप को प्राप्त हो जाता है