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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 72–75

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 72–75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 72-75

संस्कृत श्लोक

चिदग्न्यौष्ण्यं जगल्लेखा जगच्चिच्छङ्खशुक्लता । जगच्चिच्छैलजठरं चिज्जलद्रवता जगत् ॥ ७२ ॥ जगच्चिदिक्षुमाधुर्यं चित्क्षीरस्निग्धता जगत् । जगच्चिद्धिमशीतत्वं चिज्ज्वालाज्वलनं जगत् ॥ ७३ ॥ जगच्चित्सर्षपस्नेहो वीचिश्चित्सरितो जगत् । जगच्चित्क्षौद्रमाधुर्यं जगच्चित्कनकाङ्गदम् ॥ ७४ ॥ जगच्चित्पुष्पसौगन्ध्यं चिल्लताग्रफलं जगत् । चित्सत्तैव जगत्सत्ता जगत्सत्तैव चिद्वपुः ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह त्रिजगत्‌श्रेणी चिद्रूपी अग्नि की उष्णता है यानी जैसे अग्नि का उष्णता से भेद नहीं है, वैसे ही चित्‌ का जगत्‌ से भेद नहीं हे, जगत्‌ चित्‌ -रूपी शंख की शुक्लता है ओर जगत्‌ चित्‌ रूपी पर्वत का मध्यभाग है यानी जैसे पर्वत और पर्वत के उदर में कोई भेद नहीं है, वैसे ही चिद्‌ से जगत्‌ भिन्न नहीं हे । जगत्‌ चिद्रूपी जल का द्रवत्वरूप है, जगत्‌ चिद्रूपी ईख की मिठास है, जगत्‌ चित्रूपी दूध का मक्खन है, जगत्‌ चिद्रूपी हिम (बर्फ) की शीतलता हे, जगत्‌ चिद्रूपी ज्वालाओं का ताप है, जगत्‌ चित्रूपी सरसों का तेल है, जगत्‌ चित्‌ रूपी नदी की लहर है, जगत्‌ चिद्रूपी शहद का माधुर्य हे, जगत्‌ चिद्रूपी सुवर्ण का ककण है, जगत्‌ चिद्रूपी फूलों की सुगन्धि है और चिद्रूपी लता का प्रथम फल है। चित्सत्ता ही जगत्सत्ता है ओर जगत्‌ सत्ता ही चिद्‌ का स्वरूप है