Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 60–61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 60–61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
अच्छेद्योऽहमदाह्योऽहमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽहमिति स्थितम् ॥ ६० ॥
विवदन्ते तथा ह्यत्र विवदन्तो यथा भ्रमैः ।
भ्रमयन्तो वयं त्वेते जाता विगतविभ्रमाः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त ज्ञान होने पर सम्पूर्ण अनर्थो की निवृत्ति हो जाती है, ऐसा दशति हैं।
तदनन्तर सच्चिदानन्दरूप मैं न काटा जा सकता हूँ, न जलाया जा सकता हूँ, न सड़ाया
जा सकता हूँ और न सुखाया जा सकता हूँ, मेँ अविनाशी, सर्वव्यापक, स्थिर स्वभाववाला
अतएव अचल (चलन आदि क्रिया से रहित) हूँ, ऐसा ज्ञान होता है