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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 85–86

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 85–86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 85,86

संस्कृत श्लोक

गगन इव सुशून्यभेदमस्ति त्रिभुवनमङ्ग महाचितोऽन्तरस्याः । परमपदमयं समस्तदृश्यं त्विदमिति निश्चयवान्भवानुभूतेः ॥ ८५ ॥ इत्युक्तवत्यथ मुनौ दिवसो जगाम सायतनाय विधयेऽस्तमिनो जगाम । स्नातुं सभा कृतनमस्करणा जगाम श्यामाक्षये रविकरैश्च सहाजगाम ॥ ८६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि दृश्य प्रपंच की सत्ता में आपका बड़ा ही आग्रह हो, तो अनुभव से (ज्ञान से) चित्‌ ओर दृश्य के भेद को हटाकर दृश्य को परमपदरूप चिन्मय जानकर उक्त चिन्मय की सत्ता से ही दृश्य के भेद को हटाकर दृश्य को परमपदरूप चिन्मय जानकर उक्त चिन्मय की सत्ता से ही दृश्य की सत्ता को स्वीकार कीजिये, ऐसा कहते हैं । हे रामजी, गगन में सर्वथा भेदशून्य गगन के समान इस महाचिति में सर्वथा भेदरहित यह त्रिभुवन है । इसलिए आप अनुभव से यह सम्पूर्ण दृश्य परमपदरूप चिन्मय है, ऐसे निश्चयवाले होइए । मुनि के इत्यादि कह चुकने पर दिन बीत गया । सूर्य अस्ताचल को चले गये । मुनियों की सभा सायंकाल के आवश्यक सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र आदि कर्म करने के लिए स्नानार्थ उठ गई रात्रि के बीतने पर प्रातःकाल सूर्य के उदय होते ही पुनः मुनियों की सभा आकर बैठ गई