Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 43–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 43,44
संस्कृत श्लोक
आकाशादपि सूक्ष्मैषा या शक्तिर्वितता चितः ।
सा स्वभावत एवैतामहंतां परिपश्यति ॥ ४३ ॥
आत्मन्यात्मात्मनैवास्या यत्प्रस्फुरति वारिवत् ।
जगदन्तमहंताणुं तदैषा संप्रपश्यति ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
तथापि पहले अहन्ता का दर्शन होता है, तदुपरान्त अहन्ता द्वारा किये गये परिच्छिन्न
जगत्रूप की प्रतीति होती है, - ऐसा कहते है ।
चिति की आकाश से भी सूक्ष्म जो शक्ति चारों ओर फैली है, वह स्वभाव से ही पहले इस
अहन्ता का दर्शन करती है । उस समय जैसे जल में जल से जल ही बुदूबुदे या लहररूप में
प्रतीत होता है, वैसे ही यह चिति भी आत्मा में आत्मा से स्वयं ही जो अतिसूक्ष्म अहन्तारूपमें
स्फुरित होती है तथा बाहर स्थूलता का अधिकाधिक उत्कर्ष करने पर अन्त में जो ब्रह्माण्डाकार
बन जाती है, उस अणुरूप अहन्ता को देखती है