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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । महाजीवात्म तद्ब्रह्म सर्वशक्तिमयात्मकम् । स्थितं तथेच्छमेवेह निर्विभागं निरन्तरम् ॥ २९ ॥ यदेवेच्छति तत्तस्य भवत्याशु महात्मनः । पूर्वं तेनेष्टमिच्छादि ततो द्वित्वमुदेति यत् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म पहले सत्यसंकल्पवाले समष्टिजीवभाव को प्राप्त होता है, तदनन्तर अपने संकल्प के अधीन रहनेवाले व्यष्टिजीवभाव को प्राप्त होता है । समष्टिजीव के संकल्प से विरुद्ध अर्थ में व्यष्टिजीवों की सत्यसंकल्पता की सिद्धि नहीं होती, यों श्रीरामचन्द्रजी की शंका का समाधान कर रहे श्री वसिष्ठजी बोले : वत्स, व्यष्टिविभाग से पहले व्यष्टिविभाग से रहित सर्वशक्तिसम्पन्न महाजीवरूप वह ब्रह्म “मैं ही सदा सब जीवों मे सत्यसंकल्प होऊँ” - ऐसी इच्छा करता है । वह जिस किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह उस महात्माको सदा शीघ्र प्राप्त हो जाती है । उसने पहले अपने सत्यसंकल्पत्व और दूसरों की इच्छा के निरोध की इच्छा की, तदुपरान्त व्यष्टिविभाग का उदय हुआ, फिर उसने व्यष्टिविभाग को प्राप्त हुए अपने अंशभूत जीवों का क्रियाक्रम दण्ड, चक्र आदि बाहरी सामग्री से इस प्रकार घुमाने से घट आदि कार्य की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार का क्रियाक्रम बनाया । केवल संकल्प से उनके कार्य की सिद्धि नहीं होती, यह भाव हे