Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । किं स्यात्परिमितो जीवो राशिराहो अनन्तकः । आहोस्विदस्त्यनन्तात्मा जीवपिण्डोऽचलोपमः ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

व्यष्टि, समष्टि ओर उन दोनो की मूलभूत वस्तु के एक होने पर व्यष्टि ओर समष्टि का मिथ्यात्व ओर उनकी मूलभूत वस्तु का सत्यत्व कैसे कहते हैं ? यही क्यों नहीं कहते कि मूलभूत वस्तु ओर समष्टि अवास्तव (मिथ्या) है ओर प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से सिद्ध व्यष्टि विभाग सत्य है, क्योकि सेना या समाज आदि स्थलों में समष्टि की निवृत्ति होने पर भी अवशिष्ट व्यष्टि से समष्टि की सत्यता देखी जाती है, इस आशय से श्रीरामचन्द्रजी बोले : भगवन्‌, क्या एकमात्र (परिमित) जीव है या अनन्त जीवों की राशि है या पर्वत के समान अनन्त आत्माओं का समुदायभूत जीवपिण्ड है ? तात्पर्य यह है कि व्यष्टिमात्र को सत्य मानें, तो व्यष्टिभूत एक जीव ही एकबुद्धि से परिमित होने के कारण या एक देश में रहने के कारण अथवा परस्पर संघर्ष से एक संघातरूप होने के कारण कल्पितरूप समष्ट्यात्मा हो सकता है