Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 64–65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 64–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 64,65
संस्कृत श्लोक
स्वयं विचित्रं स्फुरति चिदण्डकमनाहतम् ।
स्वयं विलक्षणस्पन्दं चिद्वायुरण्डजात्मकः ॥ ६४ ॥
स्वयं विचित्रं कचनं चिद्वारि न निखातगम् ।
स्वयं विचित्रधातुत्वं श्रेष्ठाङ्गमपि निर्मितम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे ब्रह्म स्वाधीन कल्पनाओं के रमसे जगद्भाव ओर जीवभावको प्राप्त हुआ है, वैसे
ही स्वाधीन बोध क्रमसे सत्-चिदानन्दनघन अपने स्वरूप में स्थित होता है, ऐसा कहते है ।
चित् संवित् स्वयं अपने स्वरूप में किसी प्रकार का विकार आये बिना ही विचित्र
आकाशके रूप में आविर्भूत होती है । तदुपरान्त चिति स्वयं ही आकाश से उत्पन्न होनेवाला
वायु होकर विलक्षण स्पन्द (कम्पन) के साथ आविर्भूत होती है । तदनन्तर आगे कहे
जानेवाले तेज की उत्पत्ति के उपरान्त चिति स्वयं जलतत्त्व बनकर विचित्र विकास को प्राप्त
होती है । उक्त जल तलाब, तलैया आदिके जल से भिन्न था, क्योकि पृथिवीकी सृष्टि से
पहले तालाब आदिसे उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता । जलकी सृष्टि होने के बाद चिति
स्वयं ही सुवर्ण, रजत आदि विचित्र धातुओं से परिपूर्ण पृथिवीततत्व को-देवता, असुर,
< अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिए - अपने भ्रमण से चक्राकार घूमने से और लोगों को भ्रमयुक्त समझ
रहे भ्रमि (भ्रमण) करनेवाले लोग “तुम भ्रमण कर रहे हो“, यों विवाद करते हैं, ऐसा अर्थ भी प्रतीत
होता है, क्योकि स्वयं चक्कर खा रहे लोगों को अन्य लोग या वस्तुएँ घूमती प्रतीत होती हैं ।
मनुष्य आदि के देहभाव को प्राप्त हुई