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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

एवं ब्रह्मैव जीवात्मा निर्विभागो निरन्तरः । सर्वशक्तिरनाद्यन्तो महाचित्साररूपवान् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस विषय का पहले विस्तार से उपपादन कर आये हैं, उसीका अब उपसंहार करते है । इस प्रकार अखण्ड, अनवच्छिन्न, अनादि, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान्‌ जीवात्मा, जो कि कभी बाधित न होनेवाले महाचैतन्यरूपी सारभूत अंश से परमार्थतः रूपवान्‌ है, ब्रह्म ही है, उससे भिन्न नहीं हे