Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
धाराः पयोमुच इव शीकरा इव वारिधेः ।
कणास्तप्तायस इव कस्मान्निर्यान्ति जीवकाः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यष्टि जीव को मानकर कल्पित समष्टि माननी चाहिए, अन्यथा मेघ की वृष्टिधार के
समान, समुद्र के जलकणों के समान और अग्नि की चिनगारियों के समान समष्टि की उत्पत्ति
मानने पर समष्टि के अनित्य होने से कृतहानि और अकृतप्राप्ति रूप दोष होगा, इस आशय
से कहते हैं।
मेघ से वृष्टिधाराओं के समान, समुद्र से जलकणों के समान, तपाये हुए लोहे के गोले से
चिनगारियों के समान ये जीव किससे आर्विभूत होते हैं ? भाव यह कि जिससे आर्विभूत होते
हैं, उसकी उपपत्ति नहीं हो सकती (& )