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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 38–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 38–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

अत्रान्तरे महाकाश इत्थमेष गणोऽप्यसन् । स्वात्मैव सदिवोदेति चिच्चमत्करणात्मकः ॥ ३८ ॥ स्वयमेव चमत्कारो यः समापद्यते चितः । भविष्यन्नामदेहादि तदहंभावनं विदुः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवों को ब्रह्मभाव की प्राप्ति या तो उपासना द्वारा समष्टिजीवभाव (हिरण्यगर्भ भाव) प्राप्तिपूर्वक क्रमश: होती है या ज्ञान से साक्षात्‌ होती है, - ऐसा कहते हैं । जैसे ताँबा आदि धातुओं की सुवर्णता रस और औषधियों द्वारा पाकक्रम से होती है या पारस के सम्बन्ध से क्रम के बिना ही तुरन्त हो जाती है, वैसे ही व्यष्टि जीवों की पूर्वोक्त ब्रह्मभावरूप महाजीवता या तो समष्टिजीव के क्रम से (पहले वे उपासना द्वारा हिरण्यगर्भपद को प्राप्त होते हैं, तदुपरान्त हिरण्यगर्भ के साथ ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं, इस क्रम से) या बिना क्रम से (ज्ञान से साक्षात्‌ ब्रह्मभाव को प्राप्त होते हैं) उदित होती है ॥ ३ ७॥ यदि भलीभाँति विचार किया जाय, तो जीवभाव और जगत्‌ भाव वास्तव में एक प्रकार का चित्‌ का चमत्कार मात्र ही है, कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं है, - ऐसा कहते हैं । यद्यपि पूर्वोक्त रीति से इस प्रत्यकू-चैतन्यरूप महान्‌ आकाश में यह जीव, जगत्‌ आदि समुदाय असत्‌ ही है, तथापि उक्त महान्‌ आकाश में चित्‌ (संवित्‌) का चमत्काररूप चिदात्मा ही जीव आदिरूप से सत्‌ की नाई उदित होता है । चिति का चमत्कार जो स्वयं ही भविष्यत्‌ नाम, देह आदि भाव को प्राप्त होता है, उसके अहंकार को भावना कहते हैं