Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
एवं ब्रह्म महाजीवो विद्यतेऽन्तादिवर्जितः ।
जीवकोटि महाकोटि भवत्यथ न किंचन ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार निष्कर्ष यह निकला कि ब्रह्म ही महाजीव है और महाजीव ही व्यष्टिजीव और
समष्टि जीव है, यों उपसंहार करते हैं ।
इस तरह ब्रह्म ही अजन्मा और अविनाशी महाजीव है तथा महाजीव ही जीवों की व्यष्टि
और समष्टि रूप दो कोटियाँ हैं, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं है