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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

यथान्धकारो दीपेन प्रेक्ष्यमाणः प्रणश्यति । न चास्य ज्ञायते तत्त्वमबोधस्यैवमेव हि ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञान जब निवृत्त होता है, तब निवृत्त हुआ अज्ञान किस रूप से रहता है ? ज्ञानरूप से उसका शेष रहना तो सम्भव नहीं है, क्योकि एक तो ज्ञान अज्ञान का कारण नहीं है, जिससे कि वह ज्ञानरूप से रहे । दूसरी बात यह है कि ज्ञान और अज्ञान में परस्पर विरोध है, इस कारण भी वह ज्ञानरूप से नहीं रह सकता। किसी अन्य के रूप से उसका परिशेष रहता है, यह भी नहीं बन सकता, क्योंकि अन्य वस्तु शेष ही नहीं रहती, ऐसी शंका होने पर कहते हैं। जैसे अन्धकार से आच्छन्न स्थान में दीपक लेकर अन्धकार को देखने से अन्धकार न मालूम कहाँ भाग जाता है, उसके मूल का पता नहीं लगता है, ठीक इरी प्रकार ज्ञान होने पर अज्ञान न मालूम कहाँ चला जाता हे ? उसका कुछ भी पता नहीं लगता