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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

विश्वं खं जगदीहाख्यं खमस्ति विबुधालयः । साकारश्चिच्चमत्काररूपत्वान्नान्यदस्ति हि ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त रीति से बतलाये गए निष्प्रपंचत्व को (प्रपंच के अभाव को) अनुमान से भी दृढ़ करते हैं। मन की चेष्टारूप (संकल्परूप) सूक्ष्म जगत्‌ शून्य ही है और देवताओं का (इन्द्रिय ओर उनके अधिष्ठाता देवताओं का) निवासभूत साकार और स्थूल जो विश्व है, वह भी शून्य ही है, क्योकि दोनों चित्‌ के चमत्काररूप हैं, उससे भिन्न नहीं हैं