Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 81
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 81 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
सत्तासत्तात्मतात्वत्तामत्ताश्लेषा न सन्ति ते ।
पल्लवान्तरलेखौघसंनिवेशवदाततम् ॥ ८१ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसा यदि है, तो चित् में असत् जगत् के आकार का भान कैसे होता है, इस पर कहते हैं ।
जैसे पत्तों के अन्दर रेशों की पंक्तियों का आकार फैला रहता हे, वैसे ही चिति स्वभाव से
ही अपने से भिन्न ओर अभिन्न रूप इस जगत् को अपने अन्दर धारण करती है यानी जैसे
पत्ता रेशों की रेखाओं के समूह के आकार को जो कि पत्ते से अलग उत्पन्न न होने के कारण
असत् ही है ओर भिन्न तथा अभिन्नरूप से पत्ते में स्थित हे, धारण करता हे