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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 47

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

जीवहेत्वादिसंत्यागे त्वं चाहं चेति संत्यज । शेषः सदसतोर्मध्ये भवत्यर्थात्मको भवेत् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्य ओर असत्य कल्पनाओं के मध्य में त्वम्‌” अहम्‌” इस प्रकार वेतन के परिच्छेद की जो कल्पना है, उसीका त्याग करना कठिन है, उसका त्याग यदि हो जाय, तो उक्त कल्पनाओं मे अवशिष्ट सद्‌ वस्तु स्वयं सन्मात्र हो जाती है, क्योकि तब विकल्प करनेवाला कोडरहताही नहीं है, ऐसा कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवभाव के प्रति कारणभूत वासना, कर्म आदि का त्याग होने पर *त्वम्‌', (अहम्‌” इत्यादि चेतनपरिच्छेद का त्याग कीजिये सत्‌ ओर असत्‌ कल्पनाओं के मध्य में जो बच जायेगा, वही सत्‌ होगा