Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
चित्तरौ चेत्यरसतः शक्तिः कालादिनामिकाम् ।
तनोत्याकाशविशदां चिन्मधुश्रीः स्वमञ्जरीम् ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्रूपी वसन्त
की शोभाभूत माया दृश्यमें आसक्तिरूप (अनुरागरूप) जल के सिंचन से चित्रूपी वृक्षमें
काल आदि नामक अपनी मंजरीको, जो कि आकाशमें (प्रथम उत्पन्न आकाश नामक
भूतमें) विकास को प्राप्त होती है, फैलाती हे । भाव यह कि जैसे वसन्तशोभा जलके सिंचन
से वृक्षोमें, ऊँची ऊँची टहनियोमे, सुन्दर बौरको उत्पन्न करती है, वैसे ही चित् की शक्ति
माया दृश्य प्रपंचमें आसक्तिवश चित् में प्रथम उत्पन्न आकाश मेँ विकास को प्राप्त काल
आदि को फैलाती है