Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
चितेर्नित्यमचेत्याया निर्नाम्न्या वितताकृतेः ।
यद्रूपं जगतो रूपं तत्तत्स्फुरणरूपिणः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
उपर्युक्त कथन से यह निष्कर्ष निकला कि नाम और रूप से रहित तथा अपरिच्छिन्न
(असीम) चित् का जो रूप है, वही जगत् का वास्तविक रूप है, ऐसा कहते हैं।
सदा अचेतन्य (रूपरहित), नामरहित और सर्वव्यापक चित् का जो रूप है, वही रूप
चित्स्फुरणरूपी (चिद्विलासरूपी) जगत् का है