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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 18–23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 18–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 18-23

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एक एव न जीवोऽस्ति राशीनां संभवः कुतः । शशशृङ्गं समुड्डीय प्रयातीव हि ते वचः ॥ १८ ॥ न जीवोऽस्ति न जीवानां राशयः सन्ति राघव । न चैकः पर्वतप्रख्यो जीवपिण्डोऽस्ति कश्चन ॥ १९ ॥ जीवशब्दार्थकलनाः समस्तकलनान्विताः । नेह काश्चन सन्तीति निश्चयोऽस्तु तवाचलः ॥ २० ॥ शुद्धचिन्मात्रममलं ब्रह्मास्तीह हि सर्वगम् । तद्यथा सर्वशक्तित्वाद्विन्दते याः स्वयं कलाः ॥ २१ ॥ चिन्मात्रानुक्रमेणैव संप्रफुल्ललतामिव । ननु मूर्ताममूर्ता वा तामेवाशु प्रपश्यति ॥ २२ ॥ जीवो बुद्धिः क्रियास्पन्दो मनोद्वित्वैक्यमित्यपि । स्वसत्तां प्रकचन्तीं तां नियोजयति वेदने ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल एकमात्र ब्रह्म ही है, यह सिद्ध करना हमारा प्रयोजन है, उक्त प्रयोजनकी सिद्धि के लिए हमने एक ब्रह्मरूप अधिष्ठान में अनेक कल्पना करने से लाघव है, यह सोचकर &. अनुपपत्ति में कारण है - समष्टि की यदि उत्पत्ति मानोगे, तो समष्टि का जन्य होने के कारण विनाश हो जाने से कृतहानि-अकृताम्यागमरूप दोष होगा । समष्टिजीवकी कल्पना कर उससे उपहित व्यष्टि जीवकी कल्पना कही है। हमारी यह कल्पना व्यष्टि ओर समष्टि में से किसी एककी सत्यता के लिए या जीवों की उत्पत्ति आदिका प्रतिपादन करने के लिए नहीं है, इसलिए इस विषयमें आपकी शंका के लिए अवकाश ही नहीं है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी बोले : हे वत्स, जब एक भी जीव नहीं है, तब जीवों की राशियों का तो सम्भव ही कहाँ है ? आपका पूर्वोक्ति प्रश्न ऐसा ही उपहासास्पद है, जैसे कोई कहे कि खरगोश का सींग उड़कर जाता है। भाव यह कि यदि खरगोश के सींग का संभव हो, तो वह उड़ कर जाता है या स्थिर रहता है, ऐसा सन्देह हो, जब खरगोश के सींग की ही सत्ता नहीं है, तब उसकी गतिविधि के विषय में संशय करना उपहास्य नहीं तो और क्या है ? जब जीव हो, तब उसकी राशि या संघात की कल्पना हो, जीव ही जब असत्‌ है, तब उसके विषय में अन्यान्य कल्पनाओं का अवकाश ही कहाँ है ? हे राघव, न तो एक जीव है, न जीवों का समूह है और न पर्वताकार कोई जीवसंघात ही है। हे श्रीरामचन्द्रजी, सम्पूर्ण दृश्य आभासों से युक्त कोई भी जीव-प्रतिभास चिदात्मा में नहीं है, ऐसा आपको दढ निश्चय हो । केवल एकमात्र शुद्ध, चिद्घन, सर्वव्यापक निर्मल ब्रह्म ही है, वह सर्वशक्तिसम्पन्न होने से जिन कल्पनाओं की भावना करता है, स्वंय तद्रूप हो जाता है। जैसे लता क्रम से अपनी कोरकितावस्था ओर प्रफुल्लितावस्था को देखती है, वैसे ही ब्रह्म भी उन- उन संकल्पात्मक वृत्तियों के क्रम से प्राप्त हुए आभासों के प्रवेश से ही मूर्तं अथवा अमूर्तरूप से आविर्भूत कल्पनाको शीघ्र देखता है । विकास को प्राप्त हो रही अपनी सत्ता को ही जीव, बुद्धि, क्रिया, स्पन्द, मन, द्वित्व, एकत्व आदि रूप से ज्ञानविषय करता है अर्थात्‌ उक्त रीति से विकास को प्राप्त हो रही अपनी सत्ता को ही जीव आदि रूप से जानता है