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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, Verses 69–71

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 14, verses 69–71 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 69-71

संस्कृत श्लोक

चिदाकाशैकशून्यत्वं जगदस्ति च नास्ति च । चिदालोकमहारूपं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ६९ ॥ चिन्मारुतपरिस्पन्दो जगदस्ति च नास्ति च । चिद्धनध्वान्तकृष्णत्वं जगदस्ति च नास्ति च ॥ ७० ॥ चिदर्कालोकदिवसो जगदस्ति च नास्ति च । चित्कज्जलरजस्तैलपरमाणुर्जगत्क्रमः ॥ ७१ ॥

हिन्दी अर्थ

चिन्मय का संसार है या नहीं है 2 यदि है, तो उसमें संसारापत्ति हो जायेगी । यदि नहीं है, तो उसका असत्ता से सम्बन्ध हो जायेगा, ऐसी आशंका करके ब्रह्म की सत्ता से जगत्‌ का सदा अस्तित्व ही है ओर अपनी सत्ता से तो उसका अस्व ही है। ऐसा कहते हैं। जगत्‌ चिद्रूपी तेज का आलोक रूप हे, ब्रह्मसत्ता से उसका अस्तित्व ही है ओर जगत्‌ सत्ता से अभाव ही हे । चिद्रूपी आकाश की शून्यतारूप जगत्‌ है भी ओर नहीं भी है, यानी ब्रह्मसत्ता से उसकी सत्ता है ओर जगत्‌ सत्ता से अभाव है । जगत्‌ चिद्रूपी आलोक का महान्‌रूपभूत हे, ब्रह्मसत्तासे उसकी सत्ता है ओर जगत्‌ सत्ता से अभाव ही है । जगत्‌ चित्‌- रूपी वायु का स्पन्दनस्वरूप है, उसका अस्तित्व है भी और नहीं भी है यानी ब्रह्मसत्ता से उसका अस्तित्व है और जगत्‌ सत्ता से अभाव है । जगत्‌ चिद्रूपी सूर्यालोक (सूर्यप्रकाश) से जनित दिवसरूप है, वह है भी और नहीं भी है । यह जगत्‌भ्रम चिद्रूपी काजल का देवविन्दुरूप है यानी तेलके जलने पर जैसे काजल ही अवशिष्ट रहता है, वैसे ही जगत्‌ का बाध होने पर चिति ही अवशिष्ट रहती है इस अभिप्राय से चिति को काजल कहा है, जैसे तेल का कार्य काजल हे, वैसे ही जगत्‌ का कार्य चिति है, इस आशय से नहीं