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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 50

उनचासवाँ सर्ग समाप्त प्रचासवाँ सर्ग चित्त के आक्रमण केउपायों का, उत्तम ज्ञान के माहात्म्य का तथा चित्तरूपी सर्प के स्थूलतारूपी दोष के हेतुओं का वर्णन ।

70 verse-groups

  1. Verse 1पूर्व सर्गोमि वर्णित गाधि के वृत्तान्त की प्रस्तुत कथा में योजना करते हैं। श्रीवसिष्ठजी न…
  2. Verses 2–4दुज्ञनिता को ही तीन प्रकारों से दशति हैं। कहाँ दो मुहूर्त के भ्रम से लोकदर्शन, और कहाँ अन…
  3. Verse 5चितनाभिः किलाऽस्येह मायाचक्रस्यसर्वतः । स्थीयतेचेत्तदाक्रम्यतन्न किंचित्‌ प्रवाधते ॥ इस प…
  4. Verse 6भगवान्‌ द्वारा उपदिष्ट माया चक्र को रोकने के प्रकार का पहले विस्तार करने के लिए उक्त का अ…
  5. Verse 7पुरुष प्रयत्न से बुद्धि द्वारा उस चित्तरूपी महानाभि के (पहिये के बीच के हिस्से के) रूकने…
  6. Verse 8जैसे रस्सी के रोकने पर रस्सी में लपेटा हुआ कसि आदि का बनाया हुआ क्रीड़ाचक्र (लट्टू ) नहीं…
  7. Verse 9आप चक्रयुद्धो मे मुख्य तथा उनको रोकने ओर घुमाने आदि में कुशल है, इसलिए आप उक्त दृष्टान्त…
  8. Verse 10हे रामचन्द्रजी, इसलिए प्रयत्न से चित्तरूपी नाभि को रोककर संसाररूपी चक्र को आत्मा को जन्मप…
  9. Verse 11इस चित्तनिरोधरूपी उपाय के बिना आत्मा को अनन्त दुःख प्राप्त हुआ हे । इस दृष्टि के प्राप्त…
  10. Verse 12इससे अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है, ऐसा कहते है। केवल चित्तवशीकरणरूप परम ओषधि के सिवा यह संस…
  11. Verse 13इसलिए हे राघव, तीर्थस्नान, दान, तपस्या आदि कर्मो का मार्ग छोडकर परम कल्याण के लिए भीतरी च…
  12. Verse 14जैसे घड़े के अन्दर घटाकाश रहता हे वैसे ही चित्तके अन्दर ही संसार हे । जैसे घड़े के नष्ट ह…
  13. Verse 15जैसे घटाकाश में रोका गया मच्छरादि जिसमें दुःखपूर्वक संसरण है ऐसे आकाश कोटर को भाग्यवश घड़…
  14. Verse 16चित्त के नाश का क्या उपाय है 2 इस पर कहते है । बाह्य बुद्धि से वर्तमान क्षण का अनायास भजन…
  15. Verse 17हे राघव, यदि आप भावी विषयों के संकल्प का ओर उसके अंशभूत पदार्थो का अनुसन्धान त्याग प्रत्य…
  16. Verse 18जब तक संकल्प कल्पना है तब तक चित्त विभूतियाँ रहती हैं तथा जब तक मेघ का विस्तार रहता है तब…
  17. Verse 19इसी प्रकार चित्त के रहने पर संकल्पो का भी वारण नहीं किया जा सकता, ऐसा कहते हैं । जब तक चे…
  18. Verse 20यदि चेतन चित्त से पृथक्‌ है यानी कूटस्थ हे, यों भावना की जाय, तो अपने सार के मूलो को (काम…
  19. Verse 21यदि कोई शंका करे कि भले ही मूल अज्ञान के साथ संसारमूर्लो का दाह हो, तथापि वेतन में फिर कल…
  20. Verse 22चित्तरहित जो चेतनस्वरूप है, वही परमार्थ सत्यता है, वही निरतिशय आनन्दरूपता है, वही परमात्स…
  21. Verse 23निन्यता के बीजों को दिखलाते है । जहाँ पर मन रहता है वहीं पर जैसे श्मशान के समीप कोए आते ह…
  22. Verse 24यदि कोई शंका करे कि ज्ञानिर्यो के भी मन है फिर उनमें आशा आदि क्यो उत्पन्न नहीं होते ? तो…
  23. Verse 25जो पदार्थ पहले वास्तविक रूप से ज्ञात हों उनका किस उपाय से अवस्तुत्वज्ञान रूप बाघ होता है,…
  24. Verse 26चित्त को अविवेक से हटाकर उद्यम के (पुरुषप्रयत्न के) साथ अवश्य इसी जन्म में ज्ञान प्राप्त…
  25. Verse 27किस मुख्य कारण का अवलम्बन करके शास्त्र आदि से भी आत्मा का अन्वेषण करना चाहिए ऐसा यदि कोई…
  26. Verse 28पूर्व श्लोक में उक्त मुख्य कारणता को स्पष्ट करते हैँ । चूँकि अपना आत्मा ही अपने से अनुभूत…
  27. Verses 29–30इसलिए आप आत्मा के लाभ के लिए सदा आत्मा में तल्लीन होइये, ऐसा कहते है । बात कर रहे, त्याग…
  28. Verses 31–33उत्पन्न हो रहे, जी रहे, मर रहे तथा अन्यान्य कर्मो मे निरत हुए आप शोधन द्वारा निर्मलता को…
  29. Verse 34वर्तमान स्थिति (बाल्यावस्था) और भविष्य स्थिति (यौवन, राज्य आदि की स्थिति) इन दोनों में जब…
  30. Verse 35अपने संकल्प से किये गये शुभ ओर अशुभरूप संकेतों मेँ जिनकी आशारूपी विषूचिका शान्त हो गई हे,…
  31. Verse 36कर्ता (विज्ञानमय), कर्म (बाह्यविषय) ओर करणो (इन्द्रियों) सहित तथा अपना स्पर्श न करनेवाले…
  32. Verse 37जाग्रत्‌ अवस्था में ही सुषुप्त की-सी निर्विकल्प तथा अत्यन्त स्थिर स्थिति की भावना कर रहे…
  33. Verse 38नाना दशा (जाग्रत्‌ और स्वप्नदशा) ओर अनानादशा (सुषुप्ति दशा) से मुक्त अथवा सृष्टि ओर प्रलय…
  34. Verse 39आत्मता (स्वता) ओर परता (अन्यता) का त्यागकर जगत्‌ की स्थिति में द्रैतज्ञानशून्य आप आत्मा क…
  35. Verse 40एक मात्र धेर्यधर्मवाली उदार बुद्धि से आशा रूप मानसिक जालो का भीतर उच्छेद कर धमधिर्म रहित…
  36. Verse 41आत्मज्ञान सम्पन्न एवं तत्त्व का आस्वाद ले रहे पुरुष के लिए हलाहल विष भी अमृत बन जाता हे ।…
  37. Verse 42जब निर्मल ओर अखण्ड चैतन्य का अज्ञान होता है तब संसाररूपी भ्रम का कारणरूप महामोह उदित होता…
  38. Verse 43जब निर्मल ओर अखण्ड स्वसंवित्‌ में (चित्त में) स्थिति होती है तब संसार भरम का कारणभूत मोह…
  39. Verse 44अपने स्वरूप को प्राप्त हुए एवं आशारूपी महासागर को पार किये हुए आपकी बुद्धि सूर्य की किरणो…
  40. Verse 45मुक्त पुरुष की अन्यत्र आशा की संभावना तो दूर रही, बल्कि अमृत आदि रसायन के आस्वाद में भी आ…
  41. Verse 46जो लोग हमारे प्रत्यगात्मभाव को प्राप्त हुए हैं यानी जीवन्मुक्त पुरुष हैं जन्म को सार्थक क…
  42. Verse 47इस प्रकार अन्य महान्‌ योगी और उपासक भी जगत्‌ में हैं ही, उनसे भी तत्त्वज्ञानी में ही कौन…
  43. Verse 48अपनी संवित्‌ से उन्नत स्थिति का उपपादन करते हैं। स्वसंविद्रूपी दिव्य चक्षुवाले तत्त्वज्ञा…
  44. Verse 49ये सूर्य आदि केवल उपकार ही नहीं कर सकते, सो बात नहीं है, किन्तु तत्त्ववेत्ता के सन्मुख अव…
  45. Verse 50तेज के कार्य प्रकाशनों मे, योगसिद्धि के वशित्व आदि प्रभावों में, शारीरिक बलवानों में, ऐश्…
  46. Verse 51तत्त्वज्ञानी श्रेष्ठ पुरुष जिस जगदीश्वर की दीप्ति से सूर्य अग्नि, चन्द्रमा, मणि और तारा द…
  47. Verse 52हे श्रीरामचन्द्रजी, जिन लोगों को तत्त्वज्ञान नहीं हुआ वे पृथिवी के बिलों मे रहनेवाले कीड़…
  48. Verse 53तभी तक अज्ञान रूपी वेताल है जब तक देहधारी सत्‌ भी आत्मा की अज्ञान से असत्ता मानने के कारण…
  49. Verse 54जो आत्मतत्त्व को नहीं जानता, उसकी सबकी-सब चेष्टाएँ दुःख के लिए ही हैँ । वह भूतल में इधर-उ…
  50. Verse 55जैसे चारों ओर से घने मेघ के उदित होने पर प्रकाश शोभा दूर चली जाती हे वैसे ही चित्त के स्थ…
  51. Verse 56इसलिए मन को प्राप्त भोगों के (विषयों के) सेवन के तिरस्कार द्वारा ओर अप्राप्त भोगों की अभि…
  52. Verse 57मन की स्थूलता के हेतु कौन हैं ? जिनके त्याग से मन में कृशता हो, ऐसी आशंका होने पर मन की क…
  53. Verse 58अहंकार के विकास से, ममतारूपी मल मे आसक्ति से तथा यह शरीर मेरा आत्मा या भोग स्थान है, इस भ…
  54. Verse 59जरा-मरणरूपी दुःख से पूर्ण, व्यर्थ ही दिन-पर-दिन बढ़े हुए दोषरूपी साँपों के विषरूप पूर्वोक…
  55. Verse 60आधि (मानसिक व्यथा) ओर व्याधि (शारीरिक व्यथा) की अभिवृद्धि से, संसार की रमणीयता, चिरस्थायि…
  56. Verse 61स्त्री, पुत्र आदि के प्रति स्नेह से तथा मणि और स्त्रियों के लोभ से, जो आपततः रमणीय प्रतीत…
  57. Verse 62दुराशारूपी दुग्ध के पान से, भोगरूपी पवन के बल से, आदरप्रदान से तथा नाना विषयों में संचार…
  58. Verse 63विष से जैसी दाह, मूर्च्छा ओर व्याकुलता होती है वैसी दाह, मूर्च्छा ओर व्याकुलता को सूचित क…
  59. Verses 64–65शरीररूपी बुरे गड्ढे में चिरकाल से उगे हुए इस अद्भुत चित्तरूपी विष वृक्ष को विचाररूपी मजबू…
  60. Verses 66–67इस समय उसी चित्त का गजरूप से वर्णन करते है। हे रघुवर, हे राजाओं में सर्वश्रेष्ठ, आप चित्त…
  61. Verses 68–69स्त्री चिह आदि कुत्सित स्थानों में नित्य आसक्ति को प्राप्त, शरीररूपी मांस के ग्रसन के तुल…
  62. Verses 70–71उसी चित्त का पिशाचरूप से वर्णन कर उसे न हटाने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, ऐसा कहते है…
  63. Verses 72–73अब मन का सर्परूप से निरूपण करते हुए उसका त्याग कराते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्तरूपी स…
  64. Verses 74–75शरीररूप शवराशियों के निरन्तर अनुसन्धान से (दूसरे पक्ष में भक्षण से) अमंगल आकार को धारण कर…
  65. Verses 76–77अव उसी मन का बन्दर के रूप से निरूपण करते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, भला चाहनेवाले, चंचल तथा…
  66. Verses 78–79अब उसी चित्त का मेघ के रूपक से वर्णन करते है। परमार्थ सुखरूप सत्‌फल के (मेघ पक्ष मेँ पकी…
  67. Verses 80–81पुण्य-पाप कर्मो से निरन्तर गाँठ देने से मजबूत बनाये गये, मन्त्रों द्वारा छिन्न-भिन्न नहीं…
  68. Verses 82–83अब मन के संकल्प का अजगर के रूपक से वर्णन कर रहे श्रीवसतिष्ठजी उसके वध का उपाय कहते है । ह…
  69. Verse 84वैराग्य से संकल्प पर विजय पाने से चित्त शुद्धि होने पर उसी प्रकार ज्ञान ओर समाधि के क्रम…
  70. Verse 85पूर्वोक्त रीति से और पूर्व मे उपदिष्ट तत्त्वबोध से प्रत्यगात्मा में उपशम को प्राप्त हुए म…