Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मुख्यं कारणमात्मैव परमात्मावलोकने ।
अगाधे पतितं रत्नं रत्नेनैवावलोक्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
किस मुख्य कारण का अवलम्बन करके शास्त्र आदि से भी आत्मा का अन्वेषण करना चाहिए ऐसा
यदि कोई कहे, तो स्वयज्योतिरूप प्रत्यगात्मा का ही अवलम्बन करके आत्मा का अन्वेषण करना
चाहिए, क्योकि उससे वेद्य पदार्थो की विलक्षणता से उसी की स्वतः प्रथिति होती है, इस आशय से
कहते है।
परमात्मा के दर्शन में मुख्य कारण आत्मा ही है, देखिये न अगाध जल में गिरा हुआ रत्न रत्न से ही
(प्रकाशमान् अपने स्वरूप से ही) देखा जाता हे