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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 78–79

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 78–79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 78,79

संस्कृत श्लोक

अभ्युत्थितं सत्फलसंक्षयाय लसन्मुखासङ्गितडित्प्रकाशम् । वर्षन्तमासारमनर्थसार्थमान्दोलितं वासनवात्ययान्तः ॥ ७८ ॥ संकल्पसंकल्पनवर्जनोग्रमन्त्रप्रभावाद्हृदयाम्बरस्थम् । सोत्साहमुत्सादय चित्तमेघं बृहत्फलं प्राप्य भवालमाद्यः ॥ ७९ ॥

हिन्दी अर्थ

अब उसी चित्त का मेघ के रूपक से वर्णन करते है। परमार्थ सुखरूप सत्‌फल के (मेघ पक्ष मेँ पकी हुई फसल) नाश के लिए असमय में उपस्थित हुए, हृदयरूपी आकाश में स्थित चिन्तरूपी मेघ, जिसके मुखसदृश बहिर्मुखवृत्ति के अग्रभाग में प्रतिबिम्बन द्वारा बिजली के सदृश चिदाभास प्रकाशसंक्रान्त है, जो अनर्थ समूहरूपी मूसलाधार वृष्टि कर रहा हे । वासनारूपी आँधी ने जिसे भीतर चक्कर में डाल रक्खा हे, उसका संकल्पो के बार-बार समर्थनों के त्यागरूप मन्त्रं के प्रभाव से उत्साहपूर्वक उच्छेद कर जीवन्मुक्तिरूप महानूपद पाकर नित्य मुक्तात्मा ही होइये