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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 68–69

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 68–69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 68,69

संस्कृत श्लोक

रतिं गतं नित्यमसत्प्रदेशे शरीरमांसग्रसनेन पुष्टम् । दुष्टक्रियाकर्कशचञ्चुदण्डमेकेक्षणं पुष्टतमोंशुकृष्णम् ॥ ६८ ॥ दूरे समुत्सारय भारभूतं दुश्चेष्टितं कर्कशमारटन्तम् । गन्धोद्गतं कायकुलायकोशाद्दोषोपशान्त्यै निजचित्तकाकम् ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

स्त्री चिह आदि कुत्सित स्थानों में नित्य आसक्ति को प्राप्त, शरीररूपी मांस के ग्रसन के तुल्य अन्तर्भाव के आपादन से पुष्ट, पर मर्मभेदनरूपी दुष्कर्म में कठोर चोंचवाले, केवल स्वार्थ में ही दृष्टि रखनेवाले, वृद्धि को प्राप्त हुई तामस वृत्तियों से मलिन, वहन करनेवाले आत्मा के भारभूत, दुष्ट चेष्टावाले, कठोर शब्दकर रहे तथा दुर्वासनाओं से आविर्भूत अपने चित्तरूपी कोए को (०३) दोषों की शान्ति के लिए शरीर रूपी घोंसले के अन्दर से दूर हटाइये