Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
एवमस्य कथं ब्रह्मन्मायाचक्रस्य रोधनम् ।
कुर्युः प्रवहतो वेगात्सर्वाङ्गच्छेदकारिणः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
चितनाभिः किलाऽस्येह मायाचक्रस्यसर्वतः । स्थीयतेचेत्तदाक्रम्यतन्न किंचित् प्रवाधते ॥
इस प्रकार भगवान् ने जो अन्त में गाधि को उपदेश दिया, उसके उपाय को जानने की इच्छा से
श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं :
हे ब्रह्मन्, अधिकारी लोग परिपूर्ण आनन्दस्वरूप आत्मा को परिच्छिन्न समझनारूप अंगच्छेद के
हेतुभूत तथा वेग से बह रहे इस मायाचक्र का निरोध कैसे करें ?