Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 64–65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 64–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 64,65
संस्कृत श्लोक
शरीरदुःश्वभ्रचिरप्ररूढं चिन्ताचयोच्चाकृतिमञ्जरीकम् ।
जरामृतिव्याधिफलौघनम्रं कामोपभोगौघविकासिपुष्पम् ॥ ६४ ॥
विचारसारक्रकचेन चित्तविषद्रुमं त्वद्भुतमद्रिकल्पम् ।
आशामहाशाखमशङ्कमेनं छिन्धि प्रसह्यात्र विकल्पपत्रम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीररूपी बुरे गड्ढे में चिरकाल से उगे हुए इस अद्भुत चित्तरूपी विष वृक्ष को विचाररूपी मजबूत आरे
से जबरदस्ती निःशंक काट डालो । विविध चिन्ताएँ ही जिसमें लम्बी-लम्बी मंजरियाँ हैं, जो जरा,
मरण ओर व्याधिरूपी फलों के समूह से लदा है, कामोपभोग के समूह ही जिसमें खिले हुए फूल हैं,
आशा ही बड़ी-बड़ी शाखाएँ हैं, विकल्प ही पत्ते हँ ओर जो पर्वत के तुल्य अचल है