Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
पर्वतात्पर्वतं यान्ति पुरोऽद्रेरिव दन्तिनः ।
परां कोटिं प्रयातस्य स्वसंवित्त्युन्नतस्थितेः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार अन्य महान् योगी और उपासक भी जगत् में हैं ही, उनसे भी तत्त्वज्ञानी में ही कौन
उत्कर्ष (श्रेष्ठता) है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
अपनी संवित् से सबसे उन्नत स्थितिवाले अतएव उत्कर्ष की परम सीमा में पहुँचे हुए तत्त्वज्ञानी के
सामने योगी आदि ज्ञानप्राप्ति के लिए उन-उन महापुरुषों के पास जाते हैं । वे जैसे हाथी मेरू आदि
पर्वत के सामने एक निकटवर्ती क्षुद्र पर्वत से दूसरे पर्वत पर जाते हैं वैसे ही जाते हुए प्रतीत होते हैं। मेरु
के समान सर्वोन्नित दृढ़रूप से विश्रान्त नहीं मालूम पड़ते हैं