Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
स्वभावमालोकयत आनन्दाद्वयसंस्थितेः ।
रसायनमपि स्वादु राम प्रतिविषायते ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्त पुरुष की अन्यत्र आशा की संभावना तो दूर रही, बल्कि अमृत आदि रसायन के आस्वाद में
भी आत्मानन्द के आस्वाद में विघ्न की संभावना से विष की नाई हेयता बुद्धि हो जाती है, इस आशय से
कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, अपनी अद्वितीयानन्दस्वरूपता का दर्शन कर रहे अद्वितीय आनन्दरूप ब्रह्म में
स्थित पुरुषों को स्वादिष्ट अमृत आदि रसायन भी प्रतिकूल विष के समान लगता है