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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

अवस्तुतां व्रजन्त्येते माध्याह्ना इव दीपकाः । अर्कादयो महालोका विद्ययाधिगतात्मनः ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

ये सूर्य आदि केवल उपकार ही नहीं कर सकते, सो बात नहीं है, किन्तु तत्त्ववेत्ता के सन्मुख अवस्तुता को ही प्राप्त होते हैं, ऐसा कहते हैं। विद्या से जिसने आत्मतत्त्व का ज्ञान पा लिया है, ऐसे तत्त्ववेत्ता के सन्मुख ये महाप्रकाशवाले सूर्य आदि मध्याह के दीपकों की नाई अवस्तुता को प्राप्त होते हैं