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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

अदृष्टादृश्यसीम्नोऽन्तः सूर्यादीन्यखिलान्यपि । न तेजांस्युपकुर्वन्ति स्वसंविद्दिव्यचक्षुषः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी संवित्‌ से उन्नत स्थिति का उपपादन करते हैं। स्वसंविद्रूपी दिव्य चक्षुवाले तत्त्वज्ञानी के, जिसकी सीमाएँ पहले किसी के द्वारा नहीं देखी गई, वर्तमान समय में व भविष्य में भी देखने योग्य नहीं है, अन्तःकरण का कल्पित सूर्य आदि सभी तेज उपकार नहीं करते हैं । इसलिए स्वसंवित्‌ से ही उसकी उन्नत स्थिति है, यह अर्थ है