Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
सकर्तृकर्मकरणान्स्वास्पर्शानन्तरा स्पृशन् ।
निर्विकल्पनिरालम्बः स्वचिन्मात्रपरो भव ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्ता (विज्ञानमय), कर्म (बाह्यविषय) ओर करणो (इन्द्रियों) सहित तथा अपना स्पर्श न करनेवाले
इस प्रकार के संसारो का जैसे मणि अपने अन्दर प्रतिबिम्बो का विस्तार करती हे वैसे ही अपने विस्तार
कर रहे, विकल्परहित तथा आलम्बन रहित आप स्वचिन्मात्र परायण होये