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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

मलं संवेद्यमुत्सृज्य मनो निर्गलयन्परम् । आशापाशमलं छित्त्वा स्वसंवित्तिपरो भव ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

वर्तमान स्थिति (बाल्यावस्था) और भविष्य स्थिति (यौवन, राज्य आदि की स्थिति) इन दोनों में जब तक देह रहे तब तक एक बुद्धि होकर स्वसंवित्‌ से ध्यान ओर समाधि में तत्पर रहिये ॥ ३ २॥ बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में, सुखों मे, दुःखो में, जाग्रत्‌ अवस्था में, स्वप्नावस्था में ओर सुषुप्ति अवस्था में स्वसंवित्‌ में (चिन्मात्र में) तल्लीन होइये ॥ ३ ३॥ बाह्य विषयरूपी मल का त्यागकर मन को खूब गला रहे आप आशापाशरूपी मल को छिन्न-भिन्न कर स्वसंवित्‌ में परायण हो जाइये