Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 66–67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 66–67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 66,67
संस्कृत श्लोक
मत्तेक्षणं चैकतटोपवेशं विश्रान्तिसौख्येष्वसमर्थमुग्रम् ।
आलोकनोत्कं सुजनक्रमाल्लखण्डस्य चण्डं सुखदुःखगण्डम् ॥ ६६ ॥
चेतोगजं कायकुकाननस्थं सुतीक्ष्णया धीकरजाग्रपङ्क्त्या ।
विदारयादीर्घविकारदन्तं क्रियाकरं राघव राजसिंह ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय उसी चित्त का गजरूप से वर्णन करते है।
हे रघुवर, हे राजाओं में सर्वश्रेष्ठ, आप चित्तरूपी हाथी को अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिरूपी नखराशियों
से चीर डालिये। उक्त चित्तरूपी हाथी के आगम, अनुमान रूपी नेत्र आत्मतत्त्व विवेक मे प्रमाद करनेवाले
हैं, वह एक बहिर्मुखरूप संसारपर्वत तट पर बैठता हे, अतएव अन्तर्मुख विश्रान्ति सुख का अनुभव
करने में असमर्थ हे, द्वेष, ईर्ष्या आदि से भीषण होने के कारण उग्र है, सज्जनो द्वारा गृहीत होनेवाले
शम, दम, तितिक्षा आदिरूप कमलवन के अवलोकन में उत्कण्ठित तो है, पर अत्यन्त क्रोधी है यानी
उसके रक्षण में अयोग्य है, सुख और दुःख ही उसके शीतल ओर गर्म बाष्प वाले मद को बहानेवाले गण्ड
स्थल हैं, वह शरीररूपी भीषण वन में रहता है और बड़े-बड़े काम आदि विकार ही उसके दाँत हैं,
अतएव वह धेर्य आदि क्रिया का उच्छेदरूप कार्य करता है