Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 31–33
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 31–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
ममेदं तदयं सोऽहमिति संत्यज्य वासनाः ।
एकनिष्ठतयान्तस्थसंविन्मात्रपरो भव ॥ ३१ ॥
वर्तमानभविष्यन्त्योः स्थित्योरादेहमेकधीः ।
स्वसंवित्त्यानुसंधानसमाधानपरो भव ॥ ३२ ॥
बाल्ययौवनवृद्धेषु दुःखेषु च सुखेषु च ।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु स्वसंवित्तिपरो भव ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पन्न हो रहे, जी रहे, मर रहे
तथा अन्यान्य कर्मो मे निरत हुए आप शोधन द्वारा निर्मलता को प्राप्त हुए संवित्मात्रांशरूपस्वात्मा में
स्थिर होइये । उत्पत्ति ओर मरण का ग्रहण उनके तुल्य सुख, दुःख तथा अन्यान्य दुर्दशाओं में भी
आत्मपरता के अविस्मरण के विधान के लिए हैं, यह समझना चाहिये ॥ ३ ०॥ यह (सन्मुख स्थित), वह
(दूर देश में स्थित) मेरा है, यह प्रत्यभिज्ञायमान देह मैं हूँ, इस प्रकार की वासनाओं का भली-भाँति
त्याग कर एकाग्रता से भीतर स्थित संवितमात्र में तत्पर होइये