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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 82–83

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 82–83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 82,83

संस्कृत श्लोक

फूत्कारदग्धाखिलपान्थलोकमत्यन्तदुष्प्रापपरप्रबोधम् । आशीविषं शोषितलोकखण्डं व्यात्त्यामिषोद्धूतशरीरदण्डम् ॥ ८२ ॥ आमन्थरं देहगुहासु गुप्तं संकल्पघोराजगरं जवेन । अकामनानाममहानलेन बलेन दग्ध्वा विभवो भव त्वम् ॥ ८३ ॥

हिन्दी अर्थ

अब मन के संकल्प का अजगर के रूपक से वर्णन कर रहे श्रीवसतिष्ठजी उसके वध का उपाय कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप संकल्परूपी घोर अजगर को, जिसने क्रोध आदि रूप सविष (विषेले) फुफकार से दक्षिण-उत्तर मार्ग से जानेवाले जीवों को जला डाला हे, जिसके फुफकार पर तत्त्व का बोध तो अत्यन्त दुर्लभ है, जो अत्यन्त विषेला है, अतएव अपने विष से जिसने सब भुवनो को संतप्त कर दिया हे, तृष्णारूपी मुँह को खोलकर विषयरूपी भोग्य वस्तुओं के लिए चार प्रकार के शरीररूपी दण्ड को जिसने कँपाया है, जो मोक्ष के उद्योग मे आलसी होने के कारण मन्दगतिवाला है ओर देहरूपी गुहा मेँ सोया है, शीघ्र परम वैराग्य नामक महाअग्नि से जवर्दस्ती भस्म करके आप अपने स्वरूप में पूर्णानन्द वैभववाले होइये