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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । निरस्तमननानन्तसंविन्मात्रपरो भव ॥ २९ ॥ जायमानस्तथा जीवन्म्रियमाणः क्रियारतः । स्वात्मन्यमलतां प्राप्ते संविदंशे स्थिरो भव ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए आप आत्मा के लाभ के लिए सदा आत्मा में तल्लीन होइये, ऐसा कहते है । बात कर रहे, त्याग कर रहे, ग्रहण कर रहे, आँखें खोल रहे, बन्ध कर रहे भी आप मनन से (मन के व्यापार से) रहित अनन्त चिन्मात्र मेँ परायण (तल्लीन) होइये