Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 50, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
चेतनं चित्तरिक्तं हि प्रत्यक्चेतनमुच्यते ।
निर्मनस्कस्वभावं तन्न तत्र कलनामलः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि भले ही मूल अज्ञान के साथ संसारमूर्लो का दाह हो, तथापि वेतन में फिर
कल्पनारूपी मल के कारण चित्त आदि की उत्पत्ति क्यो नहीं होती है ? इस पर कहते है ।
चित्त से पृथक् हुआ चेतन प्रत्यकृचेतन (आत्मा) कहा जाता हे । वह स्वभावतः मनरहित हे । उसमें
कल्पनारूपी मल का संभव नहीं हे