Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 81
अस्सीर्वो सर्ग समाप्त इक्यायीवों सर्ग कुण्डलिनी के प्रसंग से रोगों की उत्पत्ति ओर उनके नाश के क्रम तथा सिद्धि ओर सिद्धं के दर्शन के उपाय आदि का वर्णन ।
56 verse-groups
- Verse 1यदा प्राणानिलो याति हृदि कुण्डलिनीपदम् । तता संविदुदेत्यन्तर्मूततन्मात्रवीजमूः ॥ (हृदय म…
- Verses 2–4प्राणरूप से अन्दर स्फुरित हुई वह कुण्डलिनी वायुधर्म ओर स्वधर्म से स्यन्द, स्पर्श और संवित…
- Verse 5अपानवायु होकर वह सदा नीचे की ओर बहती है। समाननाम से नाभि के बीच में तथा उदाननाम से ऊपर स्…
- Verses 6–8वृत्तिभेद का यानी भिन्न-भिन्न स्थानों में उसके रहने का प्रयोजन कहते हैं। अधोदेश में बहने…
- Verse 9अतएव प्राण और अपान वायु के गतिनिरोध के अभ्यास से सव अंगों के अन्दर सामान्यवृत्ति से अन्यव…
- Verses 10–16एक सौ प्रधान नाडियाँ हैं और सामान्यनाडिरयोँ तो उनकी शाखाएँ हैं, उनमें अन्नरस पहुँचानेवाली…
- Verses 17–28आधियों की उत्पत्ति में कारण बतलाते हैं। तत्त्वज्ञान और इन्द्रियनिग्रह के अभाव से चित्त मे…
- Verse 29आधियो से (मानसिक पीडाओं से) व्याधियाँ कैसे उत्पन्न होती हैं और उनकी कैसे चिकित्सा की जाती…
- Verses 30–39आधि से व्याधि कैसे उत्पन्न होती है ? पहले यही बतलाते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्र…
- Verses 40–42आधियों के उपशम का उपाय बतलाते हैं। हे साधो, शुद्ध और पवित्र साधुसेवनरूप क्रिया से मन ऐसे…
- Verses 43–47प्रासंगिक प्रश्न का उत्तर देकर अब जो प्रकृत सिद्धि मे हेतु है, उसका निरूपण आरम्भ करते हैं…
- Verses 48–49वह कुण्डलिनी ऊपर कैसे चली जाती है, यह कहते हैं। ओर उस समय नाड़ियों में वायु भर जाने से अव…
- Verses 50–52आकाशगामी सिद्धो के दर्शन में उपाय बतलाते हैं। जिस समय दूसरी नाडियों के व्यापार को रोक देन…
- Verse 53इन दोनों में पहले कैसे होगा 2 इस अंश का इष्टापत्ति से महाराज वसिष्ठजी परिहार करते हैं। मह…
- Verse 54तो फिर वे किससे दिखाई देते हैं, कहते हैं। हे राघव, योग के अभ्यास से मन के संस्कृत हो जाने…
- Verse 55सिद्धो का वह दर्शन (किस तरह का होगा” इस प्रश्नांश का उत्तर कहते हैं - जिस तरह स्वप्न में…
- Verse 56जिस उपाय से दूसरों के शरीर में प्रवेश की सिद्धि होती है, अब वह उपाय बतलाते है। (&) देखिये…
- Verse 57केवलोऽथ विशेषोऽयं सिद्धप्राप्तौ स्थिरार्थता“ यह जो आपने कहा, उसमें स्वभाव ही कारण है, यह…
- Verse 58सत्यसंकल्प परमेश्वर की सृष्टिकाल में संकल्यप्रयुक्त वस्तुस्वभाव की नियति भी सृष्टिकाल तक…
- Verses 59–60काल और देश के भेद से भी वस्तुओ की शक्ति मेँ अनियतता (अनिश्वितता) देखी गयी है, इसे कहते है…
- Verse 61अब, अणिमा और महिमा नामक सिद्धि की किस उपाय से सिद्धि होती है, यह श्रीरामचन्द्रजी पूछते है…
- Verses 62–63अगले सर्गमें इस प्रश्न का उत्तर विस्तारपूर्वक बतलाने की अभिलाषा रखते हुए उसकी भ्रूमिकारूप…
- Verses 64–68प्राण और अपानवायु के संघर्ष की उपपत्ति के लिए परस्पर एक दूसरे को अपनी ओर जो खींचते हैं, उ…
- Verse 69जीर्ण बनाने की विधि बतलाते हैं। पूर्वोक्त हृदयपद्म तथा नाडीरूपी भाथी प्राणवायु से आहत होक…
- Verses 70–71उन सातों धातुओं के स्थान में उत्तरोत्तर परिणाम की सिद्धि के लिए परस्पर एक दूसरे के संघर्ष…
- Verses 72–73सम्पूर्ण शरीर मे व्याप्त उसी जठराग्नि की योगी लोग हृदय-कमल में तारों के आकार से उपासना कर…
- Verse 74चिद्रूप से उपास्यमान वही तेज व्यवहित और दूर दूर के सम्पूर्ण पदार्थों को देखने की सामर्थ्य…
- Verse 75देह मे स्थित इन्धनभूत वन्द्रांश का लक्षण से विभाग करके (यह शरीर अग्नि और सोम स्वरूप है” य…
- Verse 76शरीर के बाहर भी संसार में प्रकाश और गर्मी से तथा शीतता ओर जडता से अग्नि और चन्द्र का ज्ञा…
- Verses 77–81अथवा चित् और जड इन दोनो से मिला हुआ, सत् ओर असत् स्वरूप, विद्याशवल ब्रह्म ही जगद्रूप ब…
- Verse 82दृष्टान्त भेद के उपन्यास का यानी भिन्न-भिन्न दृष्टान्त देने का दूसरा तात्पर्य बतलाते हैं।…
- Verse 83दो दृष्टान्त कार्यकारणभाव के लिए हैं, इस पक्ष में भी अवान्तर दो भेदो में दो तात्पर्य हैं…
- Verse 84उपयुक्त दो कार्य-कारणभावों में पहले का उपपादन करते हैं। जहाँ पर अंकुर बीज की नाईं एक से द…
- Verse 85दूसरे का उपपादन करते हैं। जहाँ एक का नाश होनेपर दूसरे की दिन और रात की नाई उत्पत्ति होती…
- Verse 86प्रथम पक्ष में, कार्य की उत्पत्तिदशा में कारण की सत्ता विद्यमान रहती है, इसमें अयं घट: मृ…
- Verse 87इसी प्रकार दूसरे पक्ष में भी, कार्य की उत्पत्ति-दशा में कारण की सत्ता विद्यमान नहीं रहती,…
- Verse 88जो वस्तु कार्य का सम्पादन करती हुई दिखाई पड़ती है, उसे ही कारण कहते हैं और कारण में कार्य…
- Verse 89अनुपलब्धि प्रमाण नहीं है-इस संदेह का निवारण करते हैं। हे रघुनन्दन, प्रत्यक्ष के समान अभाव…
- Verse 90शरीर के बाहर जगत् में सद्रूपपरिणाम से चन्द्र का कारण अग्नि है, इसमें उदाहरण देते हैं। धू…
- Verse 91अभावपरिणाम से भी उसका उदाहरण देते हैं। नष्ट होने से शीतता को प्राप्त होने के कारण वही अग्…
- Verse 92सद्रूप परिणाम से अग्नि और चन्द्र - ये दोनों परस्पर एक दूसरे के कारण हैं, इनका एक-एक जगह उ…
- Verse 93सूर्यात्मक तेज अमावास्या तक (&) इसमें "यदा वा अग्निरुद्धायति वायुमेवाप्येति" यह श्रुति प्…
- Verse 94मुख के सदृश सुशोभित हो रहे चन्द्रमा से युक्त वसन्त ओर ग्रीष्म ऋतु के आनेपर गरमी से युक्त…
- Verse 95यदि आप यह समझते हों कि वायु पृथिवी का रस नहीं सोखता, किन्तु सूर्य की किरणें ही उसे पी जात…
- Verse 96और उसमें जो शैत्य और द्रवत्व का नाश तथा उष्णता और रुक्षता की जो उत्पत्ति है, उस अंश में व…
- Verses 97–99सर्वत्र अग्नि ओर चन्द्रस्वरूप परिणाम में उभयरूप संकीर्णता भी सूक्ष्म दृष्टि से अच्छी तरह…
- Verses 100–102तम और प्रकाश की जो सन्धि है, वह तो उभयविलोपात्मक एक शून्यरूप ही है, अतः उसमें उन दोनों से…
- Verse 103प्रकाश और अप्रकाश रूप से आविर्ूत हए चित् ओर जड़ इन दोनों के अंशों से ही जगत् अग्नि और व…
- Verses 104–105बाहर सूर्य के उदय से जैसे तम की निवृत्ति होती है वैसे ही अन्दर चरमवृत्ति से चिदादित्य के…
- Verse 106दृष्टान्त और दाष्टन्ति दोनों मे युक्ति ओर फल बतलाते हैं। चन्द्रमण्डल में प्रविष्ट हुई सूर…
- Verses 107–109इससे भी चिति को देहधर्मो का भ्रम हो जाता है, यह कहते हैं। क्रिया और उपाधि से शून्य वह केव…
- Verse 110इन दोनों की परस्पर न मिली हुई स्थिति कहाँ प्रसिद्ध है, यह कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, उ…
- Verse 111प्राण ओर अपान वायु अग्नि और चन्द्र स्वरूप हैं, यह जो पहले कहा गया था, उसका प्रकृत में उपय…
- Verses 112–114दीवार और प्रकाश के तुल्य इन दोनों की परस्पर तादात्म्यस्थिति का अवलोकन कराते हैं। अपान वाय…
- Verses 115–116हृदयाकाश में कलाग्रास द्वारा क्रमशः ग्रसित हो रहा चन्द्रमा सूर्य के स्थान में पहुँचकर, जै…
- Verses 117–119अब अधरिचक या अर्धपूरक से मध्य में दोनों ओर से प्राण के निरोध द्वारा बिम्ब और प्रतिबिम्ब क…