Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 50–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 50-52
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मनाडीप्रवाहेण शक्तिः कुण्डलिनी यदा ।
बहिरूर्ध्वं कपाटस्य द्वादशाङ्गुलमूर्धनि ॥ ५० ॥
रेचकेन प्रयोगेण नाड्यन्तरनिरोधिना ।
मुहूर्ते स्थितिमाप्नोति तदा व्योमगदर्शनम् ॥ ५१ ॥
श्रीराम उवाच ।
दर्शनं कीदृशं ब्रह्मन्नयनांशुगणं विना ।
अदिव्यानामिन्द्रियाणां तत्त्वमेव कथं भवेत् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशगामी सिद्धो के दर्शन में उपाय बतलाते हैं।
जिस समय दूसरी नाडियों के व्यापार को रोक देनेवाले रेचक प्राणायाम के प्रयोग से ऊपर की ओर
खींच ली गयी कुण्डलिनीरूपा प्राणशक्ति सुषुम्ना नाड़ी के भीतर प्राणवायु के प्रवाह से मस्तक के दोनों
कपालों की सन्धिरूप कपाट (केवाड़ी) के बाहर बारह अंगुल के षोडशान्तनामक स्थान में मुहूर्तभर के
लिए स्थित रहती है, उस समय आकाशगामी रिद्धों का दर्शन होता है (७) । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा :
ब्रह्मन्, हम लोगों की इन्द्रिय से अदिव्यता के कारण ही सन्निकर्ष रहने पर भी जब सिद्धों का दर्शन नहीं
होता तब (आप कृपाकर बतलाइये कि) चाक्षुषप्रभासन्निकर्ष के बिना षोडशान्तनामक स्थान में केवल
प्राणधारण से सिद्धो का दर्शन कैसे होगा ओर फिर वह किस तरह का होगा