Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 48–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 48–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
तदा समस्तमेवेदमुत्प्लावयति देहकम् ।
नीरन्ध्रं पवनापूर्णं भस्त्रेवाम्बु ततान्तरम् ॥ ४८ ॥
इत्यभ्यासविलासेन योगेन व्योमगामिना ।
योगिनः प्राप्नुवन्त्युच्चैर्दीना इन्द्रदशामिव ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
वह कुण्डलिनी ऊपर कैसे चली जाती है, यह कहते हैं।
ओर उस समय नाड़ियों में वायु भर जाने से अवकाशरहित पैर से लेकर मस्तक तक बिलकुल
हलके हुए इस शरीर को कुण्डलिनी इस तरह ऊपर उठा ले जाती है जिस तरह पवनपूर्ण जलगत भाथी
(धौंकनी) नर को जल के ऊपर उठा ले जाती है, यही योगियों का आकाशगमन है। इस तरह अभ्यासरूप
विलास से युक्त आकाशगामी योग से (&) अर्थात् आकाश के साथ शरीर का सम्बन्ध रखने के लिए
किये गये संयमरूप योग से योगी लोग ऊपर गति को ऐसे प्राप्त हो जाते हैं, जैसे भिखारी लोग (किसी
पुण्य के योग से) इन्द्रपदवी को । तात्पर्य यह है कि जैसे गरीब आदमी किसी पुण्य के योग से इन्द्रपदवी
प्राप्त कर मारे आनन्द के उड़ने लगता है वैसे ही योगी लोग अपने योग के बल से आकाश में जाकर
आनन्द से उड़ने लगते हैं