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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 112–114

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 112–114 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 112-114

संस्कृत श्लोक

अपाने शीतले सत्तामेत्युष्णः प्राणपावकः । प्रतिबिम्बमिवादर्शे स च तस्मिंस्तथैव हि ॥ ११२ ॥ चिदग्निः पद्मपत्रस्थं सोमं वाचात्मकं त्विषा । जनयत्यनुभूत्येह कुड्यालोकं यथा बहिः ॥ ११३ ॥ संसृत्यादौ यथा काचित्संविच्छीतोष्णरूपिणी । अग्नीषोमाभिधां प्राप्ता सैव सर्गे नृणामिह ॥ ११४ ॥

हिन्दी अर्थ

दीवार और प्रकाश के तुल्य इन दोनों की परस्पर तादात्म्यस्थिति का अवलोकन कराते हैं। अपान वायु के शीतल होने पर उष्णप्रकृति प्राणरूप अग्नि अपनी सत्ता को प्राप्त होती है और दर्पण में प्रतिबिम्ब की नाईं प्राणवायु के उष्ण होने पर अपान भी सत्ता को प्राप्त होता है। मूल प्राण कुण्डलिनीरूप चिदग्नि मूलाधार से लेकर कण्ठपर्यन्त चार दलवाले कमल में स्थित परा से लेकर वैखरीपर्यन्त वाणीरूप चन्द्रमा को अर्थप्रकाशनरूप शक्ति से (अनुभव से) इस तरह उत्पन्न करती है, जिस तरह बाहर दीवारप्रकाश को सूर्य | जैसे सर्ग के प्रारम्भ में मायाशबल कोई ब्रह्म-संवित्‌ शीतोष्णरूप ब्रह्माण्डाकार से अग्नि और चन्द्र नाम को प्राप्त हो गयी है वैसे ही मनुष्यों के यानी व्यष्टि देहों के सर्ग में भी वही संवित्‌ व्यष्ट्याकार से अग्नि और चन्द्र नाम को प्राप्त हो गयी है