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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verses 64–68

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verses 64–68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 64-68

संस्कृत श्लोक

तस्य कुण्डलिनी लक्ष्मीर्निलीनान्तर्निजास्पदे । पद्मरागसमुद्गस्य कोशे मुक्तावली यथा ॥ ६४ ॥ आवर्तफलमालेव नित्यं सलसलायते । दण्डाहतेव भुजगी समुन्नतिविवर्तिनी ॥ ६५ ॥ द्यावापृथिव्योर्मध्यस्था क्रियेव स्पन्दधर्मिणी । संविन्मधुविबोधार्को हृत्पद्मपुटषट्पदी ॥ ६६ ॥ तत्सर्वं शक्तिपद्मादि बाह्येनाभ्यन्तरैस्तया । हृदि व्याधूयते वातैः पत्रवृन्दमिवाभितः ॥ ६७ ॥ यद्वद्व्योम स्फुरत्यङ्ग स्यभावात्तत्र वायवः । बलवन्मृदु यत्किंचिद्भृशं कवलयन्ति तत् ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राण और अपानवायु के संघर्ष की उपपत्ति के लिए परस्पर एक दूसरे को अपनी ओर जो खींचते हैं, उसमें कारण कहते हैं। कुत्सित इस देहरूप यन्त्र के उदर-प्रदेश में नाभि के ऊपर तथा नीचे मिल रहे अतएव परस्पर जुट रहे मुखवाले आमाशय और पक्काशयरूपी दो भाथी के सदृश स्थूलमांस काँपता हुआ ऐसे स्थित है जैसे ऊपर आकाश में स्थित तथा नीचे जल में निमग्न परस्पर जुट रहे अपने दो हिस्सों से युक्त नीचे जल और ऊपर वायु से खींचा जा रहा बेंतों का कुंज ॥६ ३॥ ठीक है, उससे प्रकृत में क्या आया ? इस पर कहते हैं। उस मांस के नीचे के हिस्से में स्थित जो भाथी के सदृश एक भाग है उसके मूलभागस्वरूप मूलाधार में सब कार्यकारणसंघात की प्राणप्रद होने से लक्ष्मी के सदुश पूर्वोक्त कुण्डलिनी भीतर उस तरह निलीन रहती है जिस तरह पद्मराग की पिटारी के भीतर मुक्तावली । जप काल में घुमाई जा रही रुद्राक्षमाला की नाई वह सदा सरसराती रहती है यानी प्राणों के ऊर्ध्वगमन द्वारा कम्पन से अव्यक्त ध्वनि करती है तथा दण्ड से आहत साँपिन की तरह वह ऊर्ध्वमुख से परिवर्तन किया करती हे । पृथिवी और आकाश के मध्य में प्राणियों की ऊर्ध्वं ओर अधोगति की हेतु विहित ओर निषिद्ध क्रिया की नाई प्राण ओर अपान वायु की ऊर्ध्वं ओर अधोगति की हेतु होने से वह स्पन्द-धर्मिणी है यानी संचरणशील है; चाक्षुषादि संविद्रूपी मधु का यानी रूपादि विषयों के आस्वाद का परिज्ञान कराने में सूर्य है और हृदयरूपी कमल सम्पुटक के भीतर की वह भ्रमरी हे । वे सब ज्ञान ओर कर्मेन्द्रिय आदि की शक्तियाँ, पूर्वोक्त हृदयकमल एवं नाड़ी समूह आभ्यन्तर के वाता द्वारा हृदय में चारों ओर उस तरह कम्पित की जाती हैं जिस तरह चारों ओर बाहर के पवन द्वारा वृक्षों के पत्तों के समूह । हे श्रीरामचन्द्रजी, जो यह विशाल बाह्याकाश स्फुरित हो रहा है, उसमें बलवान काष्ठ, पाषाण आदि तथा कोमल पत्तों और तृण आदि को जैसे वायु स्वभावतः जीर्ण बना डालती है वैसे ही हृदयाकाश में भी प्राणवायु भुक्त अन्नादि को जीर्ण यानी परिपक्व बना डालती हैं