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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 74

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 74

संस्कृत श्लोक

तस्याग्नेर्वाडवस्येव जलं संशुष्कमिन्धनम् । मांसपङ्कजखण्डाढ्यं हृत्सरः कोशवासिनः ॥ ७४ ॥

हिन्दी अर्थ

चिद्रूप से उपास्यमान वही तेज व्यवहित और दूर दूर के सम्पूर्ण पदार्थों को देखने की सामर्थ्य उत्पन्न करता है, यह कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, उपासित हुआ वह तेज वह प्रकाशस्वरूप ज्ञान प्रदान करता है, जिससे लाख योजन की दूरी पर स्थित वस्तु सदा आँखों के सामने दिखाई देती है ॥७ ३॥ उस अग्निका इन्धन बतलाते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस तरह बड़वाग्नि का इन्धन समुद्र का जल है उसी तरह मांसरूपी सरोवर के भीतर रहनेवाली उस जठराग्नि का भी जलने योग्य इन्धन शरीर में वर्तमान अन्न रसरूप जल है