Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 81, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
मुखाद्बहिर्द्वादशान्ते रेचकाभ्यासयुक्तितः ।
प्राणे चिरं स्थितिं नीते प्रविशत्यपरां पुरीम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस उपाय से दूसरों के शरीर में प्रवेश की सिद्धि होती है, अब वह उपाय बतलाते है।
(&) देखिये भगवान् पतंजलिमुनि का योगसूत्र :
कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाऽऽकाशागमनम् ।
(७) देखिये योगसूत्र : मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनन्" ।
रेचक प्राणायाम के अभ्यासरूप युक्ति से मुख से बाहर बारह अंगुलपरिमित देश में प्राण को
चिरकालतक स्थित रखने पर योगी अन्य शरीर में प्रवेश कर सकता हे